Thursday, May 7, 2015

अपना मांगे हक - महिलाओ के घरेलू श्रम को मिले मान्यता


अपना मांगे हक - महिलाओ के घरेलू श्रम को मिले मान्यता
 साधना श्रीवास्तव
महिला एवं पुरूष दोनों समाजरूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। महिलाओं के विकास के बिना किसी भी राष्ट्र का विकास संभव नहीं है। महिलाएँ परिवार, समाज एवं सुदृढ़ राष्ट्र की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।  महिला मानव परिवार, सभ्यता एवं संस्कृति का आधार स्तम्भ है। महिलाओं की स्थिति से व्यक्तिगत परिवार, समाज एवं राष्ट्र की सामाजिक आर्थिक स्थति प्रभावित होती है। महिलाएं जनसंख्या का आधा भाग है। अतः महिलाओं का विकास अत्यन्त आवश्यक है। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान में महिलाओं के उत्थान के लिए शिक्षा एवं रोजगार से सम्बन्धित समान अवसर, समाज आजीविका, समान कार्य के समान भुगतान के अधिकार दिए गए हैं। इस प्रकार महिलाओं को विकास की मुख्य धारा से जोड़े बिना किसी समाज, राज्य एवं देश के आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। महिला सशक्तिकरण भारत में महिलाओं की स्थिति आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से काफी सुधार आया है। स्त्री शिक्षा हेतु सरकार की विभिन्न योजनाओं ने स्त्री साक्षरता में वृद्धि की है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति -जनजाति हेतु आरक्षण की व्यवस्था, चिकित्सा, बैकिंग, मीडिया आदि सभी क्षेत्र महिलाओं के प्रभुत्व से अछूते नहीं है। जिससे उनकी भूमिका में बढोत्तरी हो, तो वही दूसरी ओर सकल घरेलू उत्पाद में महिलाओं के घरेलू श्रम का काई ठोस पैमाना नहीं तो असंगठित क्षेत्र में कामगारों और महिला श्रम के प्रति भेदभाव है। परंतु हाल ही में अनेक समाचार पत्रों की सुर्खियों में आयी एक खबर ने हलचल मचा दी साथ घरेलू महिलाओं की स्थिति पर एक बार फिर विचार करने की आवश्यकता समझ आयी खबर थी कि सर्वोच्च न्यायलय ने महिलाओं के घरेलू श्रम को सही मुआवजा और हक दिलाने की बात कही महिलाओं के घरेलू श्रम के कानूनी हक पर आम जनता क्या विचार रखती है यह जानने को जब मैं समाज में निकली तो जनता उद्गार कुछ इस तरह से निकले।


कानपुर के पास उन्नाव के पास की रहने वाली और कानपुर के रामा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की मोनिका सिंह का कहना है कि हमारे देश में महिलाओं को देवियों का स्वरूप माना जाता हैं। इनकी तुलना आदिशक्ति से की जाती हैं। इन्हे गृह लक्ष्मी भी कहा जाता हैं परन्तु जब बात इनके हक स्वास्थ्य और समाजिक मान कि आती हैं तब हमारे देश में ऐसा कोई भी कानून नहीं हैं जो इन्हे इनके किये गये श्रम की आर्थिक मान्यता दिला सकें।
हमारे देश में 16 करोड महिलाओं का मुख्य काम घर की जिम्मेंदारियां निभाना हैं पर इस एवज में इन्हे कोई भी मेहनताना नहीं मिलता है और ना ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था में कोई भागीदारी मिलती हैं।
जब भी इस विषय पर बात हुई तब दो वर्गो में एक बड़ी बहस हुई हैं एक वर्ग वह है जो  इसे एक भावनात्मक काम के रूप में देखते हैं और दूसरे वो जो इसे महिलाओं की आर्थिक मान्यता के रूप में देखते हैं पर कभी कोई ठोस नतीजा नही निकला है।
 ऐसे कई मामले सामने आये जिस में घरेलू महिलाओं की सडक दुर्घटना में मृत्यु हो गई लेकिन उनको कोई मुआवजा नहीं मिला क्योकि हमारे देश में ऐसा कोई कानून नहीं हैं।
सन् 1947 से बहुत बदलाव आये हैं अब एक और बदलाव कि जरूत हैं जो घरेलू महिलाओं को उनका हक और उनके द्वारा किये गये श्रम की आर्थिक मान्यता दिलाने की एक पहल होगी। 
इस बदलाव कि पहल में हर महिला को भाग लेना होगा और अपने हक के लिये आवाज उठानी होगी।




वही कानून के जानकार और विधि विभाग, बी0बी0डी0 यूनिवर्सिटी लखनऊ के श्री जगदीश प्रसाद का कहना है कि भारत, स्वतन्त्रता के बाद भले ही दुनियां का सबसे बड़ा लोकतन्त्र बनकर उभरा है और इसके समस्त नागरिकों को देश के सर्वोच्च कानून (संविधान) के द्वारा बिना किसी लिंगीय भेदभाव के सामाजि, आर्थिक व राजनैतिक न्याय व स्वतन्त्रता प्रदान की गयी किन्तु व्यावहारिक रूप से आज भी विशेषकर महिलाओं के सम्बन्ध में प्राचीन सामाजिक व्यवस्था ही जारी है जिसके अन्तर्गत देश की लगभग आधी आबादी दूसरे (पुरूष) पर आर्थिक रूप से निर्भर है। निश्चित रूप से भारत जैसे पारम्परिक एवं धार्मिक देश में महिला को परिवार की धुरी माना जाता है किन्तु उसके दिन भर के रोजमर्रा व घरेलू कार्य की वास्तविक मूल्य न तो सामाजिक रूप से मान्य है और न निर्धारित ही है। आधुनिक मानवतावादी युग में सम्पत्ति का अधिकार एक मानव अधिकार तथा श्रम के बदल पारिश्रमिक पाना एक मौलिक अधिकार है फिर भी घरेलू महिला के द्वारा घर के अन्दर किये गये कार्य का उचित पारिश्रमिक किसी भी कानून के द्वारा संरक्षित नहीं किया गया है तथा राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद(जी0डी0पी0) में शामिल नहीं किया जाता है। यद्यपि कि हिन्दू विवाह अधिनियम एवं दण्ड प्रक्रिया संहिता मंे उसे अपने पति या संरक्षक से भरण-पोषण पाने का अधिकार दिया गया है तथा संविधान के नीति निर्देशक तत्व में राज्य को महिला के स्वास्थ्य एवं उचित पोषण के लिए योजना बनाने के लिए निर्देशित किया गया है किन्तु निजी स्वतन्त्रता के रूप में अपनी आर्थिक निर्भरता के लिए आज भी महिलाओं को दूसरों पर आश्रित रहना पड़ रहा है तथा उसके समस्त श्रम का पारिश्रमिक केवल भावनात्मक मूल्य तक ही सीमित है लेकिन अब समय आ गया है कि सरकार को घरेलू महिला(हाउस वाइफ) के पारिश्रमिक को एक विधिक अधिकार के रूप में सुरक्षित रखने के लिए कानून बनाये ताकि संविधान के उद्देश्य- सभी व्यक्तियों को सामाजिक व आर्थिक न्याय प्रदान किया जा सके तथा गरिमामय जीवन के साथ हर क्षेत्र मंे पुरूष के समान ही महिला की भी भागीदारी एवं योगदान सुनिश्चित हो सके।

अंत में यही कहा जा सकता है कि हमेशा खुश रहने वाली, चुपचाप अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने वाली घरेलू महिलाओं के द्वारा किये गये कार्यो का उन्हें कोई प्रतिकार नहीं मिलता है वह कभी श्रमिक की तरह हड़ताल नहीं कर सकती है वरना तो दुनिया रूक सी जायेगी । पुरूषसत्तामक समाज हिल जायेगा। घरेलू कार्यो  और घर की जिम्मेदारी को किस रूप में देखा जाये यह आज भी विवादित प्रश्न है अधिकांस घरेलू महिलाओं का सम्पूर्ण जीवन सहने में बीत जाता है बिना कुछ बोले मुश्किलों में रहने की आदत हो जाती है। घरेलू श्रम की उउपेक्षा और महिलाओं को सामाजिक आर्थिक न्याय दिला पाना अभी भी भारत में चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसकी प्रमुख वजह सामाजिक परिवेश और इस दिशा में पर्याप्त कानूनों का अभाव है अभी भी घरेलू काम को हक दिलाने की दिशा में समाज दो वर्गो में बॅट गया है एक इनके अधिकारों की बात करता है तो दूसरा वर्ग कहता है कि घर की देखभाल, परिवार की सेवा और रिश्तों का मान तो नारी सौंदर्य है भावनाए और नारी का गहना है इस वर्ग का यह भी कहना है कि माॅ, बेटी ,पत्नी ,बहन के काम को पैसों में क्यों मापा जाये क्या जरूरत है इन्हें घरेलू कार्यो के मुआवजे की लेकिन शायद यह वर्ग यह भूल जाता है कि महिलाओं को प्यार और समर्पण की प्रतिमूर्ति बनाकर चौराहे की मूर्ति बनाने की जरूरत नहीं कि अपने दुख दर्द मिटाने तो माॅ, बेटी ,पत्नी ,बहन और कुछ देर में ही खुद प्रसन्न हो उसे सर्दी, गर्मी और बारिश के मौसम को अकेला छोड़ देना बल्कि जरूरत है घरेलु क्षम केे महत्व को समझने की और महिलाओं सुरक्षा ,अधिकारों उन्हें सामाजिक, आर्थिक और कानूनी संरक्षण देने की है क्योकि वह बिखरे परिवार को एक माला की तरह पिरोती है वो इतनी कुशलता से घर सम्हाले रहजी है  कि किसी को घर की चिन्ता नहीं रहती है। चाहे वो बूंढ़े माँ-बाप की देखभाल हो या बहनों की शादी या फिर बच्चों को अच्छी परवरिश वह सभी जिम्मेदारीयों को बखूबी निभाती है।
साधना श्रीवास्तव 
                         

Saturday, May 2, 2015

गाय कभी अपना दूध दही और पनीर किसी जाति या धर्म देख कर नही देती न बेचारे बैल जब खेतो में हल चलते तो ये नहीं खोजते की ये अनाज  कौन खायेगा ???????? …………………ये बेजुबान तो सब की सेवा करते फिर क्यों आज का मानव इतना स्वार्थी हो गया क्या हो गया है हमे  

Monday, April 6, 2015

meri sajani poster


Ganga



पहनावा नहीं सोच बदलनी होगी, आवाज नहीं आग़ाज चाहिये


पहनावा नहीं सोच बदलनी होगी, आवाज नहीं आग़ाज चाहिये
बी0बी0सी0 के द्वारा बनायी फिल्म से उठते विवादों और हाल ही में निर्भया के दोषी मुकेश ने बी0बी0सी0 में बयान दिया कि गलती निर्भया की थी इसी के साथ उसने लड़कियों के  पहनावे और व्यवहार पर भी अपनी राय दे दी।
बी0बी0सी0 के द्वारा बनायी फिल्म का प्रदर्शन 8 मार्च को होना तय था परन्तु एक भारत में इसे सरकार ने बैन कर दिया और वही दूसरी ओर निर्धारित तिथि से पहले ही इसका प्रदर्शन इंटरनेट पर कर दिया गया। तमाम कोशिशों के बाद भी लगभग दो लाख लोगों ने इसे देखा।
समाज दो वर्ग में बॅट गया एक वर्ग फिल्म के प्रदर्शन की माॅग करने लगा और दूसरा वर्ग फिल्म पर प्रतिबंध को उचित ठहराने लगा। 
इस घटना ने जहाॅ भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिहन लगाा दिया वही सायबर सुरक्षा का प्रश्न भी लोगो के जेहन में आने लगा है।
इस बारें में समाज क्या चाह रहा है यह जानने के लिए मैने बहुत लोगों से मुलाकात की प्रस्तुत है उनसे बात-चीत के प्रमुख अंश-

 1 सी0एम0एस0 सामुदायिक रेडियो लखनऊ की प्रोग्राम कोडिनेटर सोमा घोष का कहना है कि मुकेश का बयान उस बीमार मानसिकता का प्रतीक है जो अपनी हर गलती और अपराध को बहुत आसानी से दूसरों के सिर पर डाल कर अपनी दोहरी मानसिकता का परिचय देते है। निर्भया के साथ जो हुआ उसकी जितनी निन्दा की जाये कम है । इस बात पर मुकेश जैसे अपराधी का भाषणबाजी करना निन्दनीय ही नहीं अक्ष्मय है कि सजा के बाद भी उसे पछतावा नहीं है और दुखद यह कि क्या भारतीय सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि कोई विदेशी जब चाहे भारतीय मुद्धद्धो पर अपनी राय थोपे.......जेल के अन्दर मुकेश तक फिल्म निर्माता कैसे पहुॅचे ? 
दूसरी सबसे अहम बात दूसरे कौन होते हम महिलाओं के पहनावे पर रोका-टोकी करने वाले दोष पहनावे का नहीं अपराधी और बीमार मानसिकता का है क्योकि आज चार साल की बच्ची हो या पचास साल का वृद्धा कोई भी सुरक्षित नहीं है।
2  वही वाराणसी की पूनम का कहना कि बी0बी0सी0 ने फिल्म बना कैसे ली ..........अब वह बनी क्या है यह देखने पर ही कोई टिप्पणी की जा सकती है लेकिन एक बात तो पक्की है कि पहनावे का दोष नहीं दोष मानसिकता का है क्योकि घर के बाहर के जो पुरूष ऐसी घिनौनी हरकत करते है वह मानसिक विकृति का शिकार होते है। पहनावे का दोष है तो हम घरों में भी सुऱिक्षत नहीं सब अपने घरों पर लड़कियाॅ, बेटी या बहन को पहचानते है और बाहर आते ही गलत टीका- टिप्पण्ी करते है। ईव टीजिंग या छेड़खानी एक ऐसी अनचाही घटना है जिससे कम से कम  भारत की हर लड़की का सामना अवश्य कभी ना कभी हुआ होगा ,मजे की बात यह है लड़की को जहाॅ इससे मानसिक पीड़ा पहुॅचती है तन मन और आत्मा आहत होती ,वही बात अगर पुरूष मानसिमता की करें तो यह उनके  लिए सिर्फ एक खेल और हल्का फुल्का मजाक है जिसे वह अपने दोस्तों को मजे से बताते है । आशय यह है कि जो बात किसी को पीड़ा दे रही वही बात दूसरे के लिए आन्नद और मजाक का विषय है। अब सवाल यह उठता है कि यह अंतर आया कहाॅ से ?इसके लिए कई बातें जिम्मेदार है जैसे सामाजिक और पारिवारिक परिवेश, लिंग  भेद ,लड़के लड़की का अन्तर,दोहरी सोच आदि ।पर इससे बड़ा सवाल यह है कि इसके लिए केवल पुरूष ही जिम्मेदार है, जवाब है नहींे। इन घटनाओं के होने का कारण जितना पुरूष है उतना महिला भी है।
3   मोनिका सिंह छात्रा एम0 जे0एम0 सी0
रामा विश्वविद्यालय,कानपुर 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार को एक मनोरंजन का पात्र बना दिया गया हैं और साथ ही दोषी मुकेश सिंह जैंसे अपराधी के एक बेफिज़ूल बयान को महत्व दिया जा रहा हैं।
जबकि ऐसा किसी भी संविधान में नहीं लिखा हैं कि रात नौ बजें के बाद लडकियाॅ बाहर नहीं जा सकती औंर जो लडकियाॅ बाहर जाती हैं वे गलत चरित्र की होती हैं। अपनी गलत सोच को बदलने कि जगह लडकियो को बुरा बोलने से आप के बुरे कर्म सही नहीं हो जाते। 
किसी लडकी या औरत के छोटे कपड़ो से आप के चरित्र और सोच में गिरावट नहीं आनी चाहिये। दूसरो के चरित्र पर दोष लगाने से बेहतर हैं आप अपने चरित्र और अपनी मानसिकता का विकास करें।
4   लखनऊ के बी0बी0ए0यू0 की छा़त्रा गुंजन जयसवाल का कहना हैं कि मेरे विचारों में निर्भया डाक्यूमेंट्री समाज में पुरूषों की औरतों के प्रति सोच दर्शाती है इसमें जो इंटरव्यू में जो बातें आयी वह आश्चर्यजनक है और दुखी करने वाले है क्योंकि जिस युग में हम आगे बढ़ने की बात करते है उसी उसी युग में कुछ लोग ऐसी मानसिकता रखकर हमें पीछे ढकेल रहे है।विकास करना है तो हमें सकरात्मक सोच से आगे बढ़ना होगा ।                                                
  सबसे बात और समाज की वास्तविक कि स्थिति की बात करे तो कह सकते है जब आप छेड़खानी की घटनाओं को इग्नोर करती है तो आपकी चुप्पी समाने वाले के लिए मौन स्वीकृति बन जाती है। आकड़ें बताते है कि ज्यादातर महिलाओं के साथ होने वाले रेप केसों का पहला कदम छेड़खानी होता है।आशय यह है कि इन घटनाओं से बच निकालने की इनकी आदत इन्हें इतना निडर बना देती कि उन्हें लगता कि वह हर अपराध कर बच निकल जायेगे,और काफी हद तक होता भी ऐसा है,कभी परिवार इज्जत की दुहाई दे करएकभी समाज के नाम पर तो कभी शादी का हवाला दे कर लड़कियों को चुप करा दिया जाता है।उन्हें रिपोर्ट तक दर्ज कराने से रोक दिया जाता है।अगर कुछ ने रिपोर्ट दर्ज करा भी दी तो समाज के ताने और सहानुभूति की जगह मजाक का पात्र बनाकर ऐसा व्यवहार किया जाता जैसे गलती उस महिला या लड़की की है।पुलिस और प्रशासन का उदासीन रवैया भी इस समस्या का एक कारण है।


कुल मिलाकर कहा जाये तो मुसीबत कितनी भी बड़ी हो आपके सम्मान से बढ़कर नहीं है।हौसले के साथ डटकर मुकाबला करे छेड़खानी की हर छोटी बड़ी घटना का पुरजोर विरोध करे। जो कुकर्म छेड़खानी से बढ़ता रेप तक आ गया उसे अगर वही रोक दिया जाये तो वह नासूर बने ही नहीं तात्पर्य यह कि जैसे ही आपके या किसी के  भी बड़ी- छोटी कैसी भी छेड़खानी की घटना हो आवाज उठाये,विरोध करे । इसके लिए समाज के पुरूष वर्ग का योगदान भी जरूरी है।इस तरह किसी भी घटना को देखते ही आवाज उठाये और इन बहादुर लड़कियों का साथ दे। बस इतने परस्पर सहयोग से यह घटनाएं जन्दी से खत्म हो जायेगी। याद रखिये पुलिस के कोर्ट के भरोसे बैठने की बजाये आप अपनी आवाज उठायें और थोड़ा समाज इसमें पीड़ित लड़की मदद करे तो यह समस्या जड़ से खत्म हो जायेगी।

पर याद रखिये इसकी पहली पहल आपको करनी पड़ेगी,खुद को मजबूत बनाना होगा। अभिभावकों अपनी लड़की को सेल्फ डिफेंस के लिए आत्म रक्षा के लिए प्रेरित करना पड़ेगा
कदम आप बढ़ाओ पीछे सारा कारवाॅ चलेगा,
थोड़ी हिम्मत तो कर के देखो सारा जमाना बदलेगा। 
साधना श्रीवास्तव  

Tuesday, March 3, 2015

मनरेगा 70

हरिया खुश था की अब हर दिन काम मिलेग……। रोज का काम और काम के दाम। ………।
उसका बेटा हरी परेशान था शहर जा के कितनी डिग्री ली ली कब से नौकरी खोज रहा  छोटा काम वो कर नही सकता और बड़े काम  मिलता नहीं। ................उसके लिए बड़ी सिफारिश और   किस्मत चाहिए।
मनरेगा का सही हिसाब का हरिया को और अच्छी नौकरी का हरी को इंतज़ार है. 

Monday, March 2, 2015

वैलेन्टाइन डे का फितूर


             वैलेन्टाइन डे का फितूर
 जितना भोला प्रसाद सरल, भोला, सच्चा इंसान था। उतना ही चालक और झूठा था प्यार का महाजाल जिसमें एक बार जो फॅस गया तो उसका ध्यान पढ़ना छोड़कर बाकी सब बातों में रहता था। भोला प्रसाद बेचारा गाॅव आये थे  पढ़ने के लिए शुरू- शुरू में वह प्यार के मामले में खुद को बहुत असहज महसूस करते थे। 
नये वातावरण व रंग-ढंग में अपने को नहीं ढाल पाया तो क्या होगा ? प्यार ने धोखा दिया और अगर प्यार के इस संघर्ष में उसकी हार हुयी तो क्या होगा ? 
कैसे कर पायेगा सामना अपने माता-पिता का ? ऐसे हजारों सवाल उसके मन में थे। लेकिन जनाब गिरते है सहसवार मैदाने जंग में प्यार की जंग में अपने शहरी दोस्तों के प्रभाव में रहकर यही सीख लिया भोला प्रसाद ने और उन्होनें भी वैलेन्टाइन डे मनाने का फैसला कर लिया। बस अब तलाश थी एक अदद मशूका की जो उसे भी प्यार की दुनिया में जीरो से हीरो बना सके ।
इस तलाश में सर्वप्रथम बलिदान पढ़ाई हुयी और अलमारी में माँ के हाथ बने लड्डू व नमकीन का अगली बारी थी। 
अपनी रिसर्च में भोला ने सबसे पहले पता चला कि लड़कियों स्मार्ट हैन्डसम लड़के पसंद होते है पेटू और मोटू के सपने तो हर वैलेटाइन में शहीद होते है।
अभी -अभी रैंगिग से बचा था कि हवा लग गयी प्यार की पहले सीनियर  रोज कैंटीन में भोला प्रसाद की रैगिंग लेने आये थे और अब प्यार के सपने दिन-रात  आने लगे । 
 रैगिंग का तुफान तो बीत गया लेकिन अब मशूका की तलाश में भोला प्रसाद को कुछ समझ नहीं आता क्या करे ? 
जब भी भोला प्रसाद की हिम्मत टूटती या फिर वह मुश्किल में पड़ता तो उसके दोस्त दिलासा देते थे। जैसे-जैसे लड़कियों खोजने की परीक्षा की घड़ी नजदीक आ रही थी वैसे-वैसे भोला प्रसाद की कोशिशे बढ़ जाती। 
जो  भोला प्रसाद पूरी-पूरी रात पढ़ाई करता वह अब अपना सम्पूर्ण फोकस प्यार की तलाश पर लगया अब तो जो कहता-‘‘ तुम बनाओ  अपना कैरियर वह उसे प्यार के दुश्मन नजर आता  अब तो बस यही ख्याल आता कि  प्यार का अपना रंग होता है जिसमें डूबकर देखो जिन्दगी कितनी हसीन हो जाती है। यह कितना खूबसूरत एहसास है एक बार जिया जाये।
 कई लड़कियों पर बहुत ट्राई किया कभी सुमन कभी मीता तो कभी सुस्मिता सारा पैसा गिफ्ट, मोबाइल और फैशन में जाता ................बचे कुचे पैसें फिल्मों के टिकट पे जाता । आखिरकार विजयदिवस आ गया मतलब काॅलेज की वैलेटाइन पार्टी का आयोजन एक क्लब मेें किया गया। सभी जोड़ों में थे, हर एक के दिल में एक हल्का गुलाबी एहसास और हाथों में लाल गुलाब था। 
पूरा दिन तो सब छुपते-छुपाते इजहार-इनकार कर रहे थे। शाम दोस्तांे के साथ भोला प्रसाद को एक क्लब में गया ।
क्लब की रौनक, मस्ती और डांस भोला के लिए सब नया था। 
बड़े हाॅल को लाल और सफेद गुलाबों गुब्बारों और चमकीले दुपट्टों से सजाया गया था। हल्की धुन में गाना बज रहा था और माहौल में एक अजीब खुमारी थी। इस डांस और मस्ती के बीच भोला प्रसाद ने देखा कि कालेज के अधिकतर लड़के-लड़कियाँ वहाँ थे। अधिकतर लड़के-लड़कियों ने लाल कपड़े पहने हुये थे। उस पार्टी में कई तरह के कम्पटीशन थे। 
डांस, ड्रेस, मस्ती व खेल-कूद के इन कम्पटीशनों के बीच सबसे आकर्षक कम्पटीशन था मि0 एण्ड मिस0 रोज डे का............ जिसका नियम था कि वहाँ उपस्थित सभी लड़कियों में जिसे सबसे ज्यादा गुलाब  मिलेंगे वह मिस रोज बनेगी। जिसको मिस रोज गुलाब देगी वह मि. रोज बनेगा। उस कम्पटीशन के इन्तजार में भोला प्रसाद ने बहुत सारे दूसरे कम्पटीशनों में भाग लिया।
भोला प्रसाद को भी बहुत मजा आ रहा था। पहली रात ऐसी थी जब भोला किताबो और पारिवारिक जिम्मेदारियों से खुद को मुक्त महसूस कर रहा था। जिन्दगी जीने का यह नया ढ़ंग जितना शुरू में असहज लग रहा था, उतना अब उसे मजा आ रहा था। काफी लम्बे इन्तजार के बाद बारी आ ही गयी। मि. एण्ड मिस रोज प्रतियोगिता की। प्रतियोगिता का परिणाम काफी चैकाने वाला रहा।
 सबसे ज्यादा गुलाब वाली लड़की विजया ने जब हर लड़का दिल थाम कर चाह रहा था कि सोनालिका उसे गुलाब दे। तब सोनालिका ने सब लड़कों को पीछे छोड़ते हुए वह गुलाब भोला प्रसाद के हाथों में पकड़ा दिया। पूरा हाॅल तालियों की आवाज से गूँज उठा। भोला प्रसाद को मि. रोज चुन लिया था।
 सोनालिका मुस्कुरा रही थी भोला प्रसाद को यकीन नहीं आया कि सोनालिका उसको चुन सकती है। भोला प्रसाद के लिये वह रात बहुत खूबसूरत थी, वह खुद सबसे अलग, सबसे खास महसूस कर रहा था। सोनालिका का साथ पाकर भोला प्रसाद को अपनी किस्मत पर यकीन नहीं आया। वह तो खुद को इस लायक समझता ही नहीं था, कहाँ स्मार्ट, सुन्दर, अमीर, तेज-तर्राक सोनालिका और गाँव का सीधा-साधा भोला प्रसाद । उस दिन के बाद से तो सभी लड़कों को भोला प्रसाद से जलन होने लगी। 
अब तो उसके बाद से भोला प्रसाद के सब दोस्त भी दूर हो गये।
भोला प्रसाद और सोनालिका का अफसाना प्यार का पूरे काॅलेज में मशहूर हो गया ।
भोला प्यार में डूब गया और पढ़ाई को भूल गया । बस यही ख्याल रहता प्यार एक ऐसा शब्द है जो जिन्दगी में रंग भर देता है। जब इंसान किसी से प्यार करता है तो खुद तो भूल जाता है बस हर ओर प्यार ही प्यार नजर आता है। जिन्दगी की मुश्किलें आसान भी करता है तो जिन्दगी में मुश्किलें बढ़ाता है। कभी हौसलों को बढ़ाता तो कभी परास्त भी करता है। जिन्दगी प्यार के इन्हींे रूपों को याद करने में बीतने लगी।
रातें करवटों में बितने लगी पर नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। मन में अजीब हलचल थी। उसे नींद भी नहीं आ रही थी। 
लेकिन भोला के प्यार पर तब वज्रपात हुआ जब भोला बी0ए0 फेल हो गया और सोनालिका मजबूर हो गयी । दोनों के घरों धमाल हो गया जब दोनों का ब्याह बिना कॅरियर गूलर का फूल हो गया और काफूर वैलेन्टाइन डे का फितूर हो गया।
साधना श्रीवास्तव