Monday, May 1, 2017

भारत में गाँवों के विकास में मीडिया की भूमिका

                  भारत में गाँवों के विकास में मीडिया की भूमिका



असली भारत गाँवों में बसता है। भारत की जीवन शक्ति का आधार ग्रामीण समाज है। अतः गाँवों का विकास किये बिना देश का विकास संभव नहीं है। अभी भी देश की अधिकाश जनसंख्या गाँवों में ही निवास करती है। किन्तु गाँवों में रोजगार अवसरों का अभाव होने के कारण गाँव वाले गरीबी, बेरोजगारी व भूखमरी जैसी समस्याओं से त्रस्त है।
जब तक हम जनजातियों और पिछड़े वर्ग के लोगों का उत्थान करने में समर्थ नहीं तब तक भारत का भविष्य अंधकारमय रहेगा। इस उक्ति पर जरा गौर करते हैं। क्या सच में असली भारत गाँवों में बसता है, असली भारत क्या है? वह क्या चाहता है? उसकी बुनियादी जरूरते क्या है?  जब तक हम ग्रामीण भारत के विकास व विस्तार की योजनाओं पर ध्यान नहीं देंगे तब विजन 2020 का सपना साकार नहीं हो सकता है। संचार माध्यम इस कार्य को वखूबी निभा सकता है। मीडिया के अनेक रूप है। फिर चाहें वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक हो हर रूप में संचार माध्यम इस कार्य को वखूबी निभा रहे है। गाँवों और संचार माध्यमों के सम्बन्धों को समझने के पूर्व आवश्यक है कि हम संचार माध्यम को समझे ।
परम्परागत मीडिया -
भारत जैसे विकासशील देश में पम्रागत माध्यमों का अपना एक विशिष्ट महत्व व योगदान है। परम्परागत संचार माध्यम वे संचार माध्यम है। जिनमें समाज की परम्परा, संस्कृति और मूल्य समाहित हैं। यह पारम्परिक माध्यम ग्राम्य संस्कृति की देन है जिसकी मौलिकता तथा विश्वसनीयता अटूट है। यह ग्रामीण जनता के निकट होते हैं तथा इसके द्वारा ग्राम्य जीवन में व्याप्त बुराईयों को दूर किया जाता है। परम्परागत जनमाध्यम में दृश्य माध्यम के अन्तर्गत कठपुतली, नृत्य, मूर्ति, चित्र तथा स्थापत्य आते हैं। श्रव्य माध्यमों के अन्तर्गत लोकगीत, लोककथा तथा परम्परागत वाद्य यंत्र जैसे शंख, टोल, मंजीरा, बाँसुरी आदि आते हैं तथा परम्परागत दृश्य श्रव्य माध्यम के अन्तर्गत ध्वनि कठपुतली रास, रामलीला, स्वांग, रंगमंच, लोकनाट्य, जनमाध्यम के रूप में सफल भूमिका का निर्वाहन कर रहे हैं।
वर्तमान युग में भले ही नव-इलेक्ट्रानिक उपकरण आ गये हैं पर गाँवों में आज भी लोककला व परम्परागत माध्यम अस्तित्व में है।
भारत लोककला की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध राष्ट्र है। जनमानस पर त्वरित गति से इसके पड़ने वाले प्रभाव की व्याख्या करते हुए सन् 1972 की यूनेस्कों रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘पारस्परिक माध्यम व्यवहारिक परिवर्तन लाने और निचले स्तर पर विभिन्न समुदायों को समकालीन मुद्दों के प्रति जागरूक बनाने में जीवंत भूमिका निभाते हैं’’।
मुद्रित माध्यम या प्रिन्ट मीडिया-
विश्व में मुद्रण का आविष्कार एक क्रान्तिकारी घटना थी। मुद्रण का आविष्कार जर्मनी के गुटबर्ग ने 1956 में किया था। भारत में पहला प्रिटिंग प्रेस 1556 में गोवा में आया। संचार माध्यमों में सबसे व्यापक व आकर्षक माध्यम के रूप में इस माध्यम की गणना की जाती है यह माध्यम अधिक विश्वसनीय व प्राचीन है। उदाहरण दैनिक समाचार-पत्र, साप्ताहिक समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, हाउस जनरल, पुस्तकें, पम्पलेट इसके अन्तर्गत आते हैं।
समाचार-पत्र-
टी0आर0 श्रीनिवासन की पुस्तक ‘‘द प्रेस एण्ड द पब्लिक’’ के अनुसार आधुनिक युग के अनेक चमत्कार देखे जा सकते हैं। उन चमत्कारों में मेरी समझ में सबसे बड़ा चमत्कार आधुनिक समाचार पत्र हैं यह अपने आप एक चमत्कार ही नहीं वरन् अनेक चमत्कारों का जन्मदाता भी है। यह चीज को बनाता और बिगाड़ता है। यह राष्ट्र की ताकत का निर्माण कर सकता है या उसे खत्म कर सकता है। यह वह धूरी है जिनके चारो ओर समस्त संसार चक्कर लगाता है। इसने आधुनिक जीवन में केन्द्रीय स्थिति प्राप्त कर ली है। आज निश्चित रूप से समाचार पत्र का युग है तथा तात्कालिक भविष्य भी इससे अलग नहीं दिखाई देता है।
समाचार-पत्र जनमत की अभिव्यक्ति का सशक्त एवं लोकप्रिय साधन है। यह लोक शिक्षा व लोक जागृति का सशक्त साधन है।
समाचार-पत्र का विकास-
जनमाध्यम के रूप में समाचार-पत्र काफी उपयोगी है। समाज के कोने कोने की खबर व उसका विश्लेषण समाचार-पत्र के माध्यम से मिलता है। समाचार-पत्र के कम्युनिकेशन पैकेज में समाचार विचार सूचना तथा विज्ञापन सब होता है।
भारत में ब्रिटिश काल में समाचार-पत्र छपना आरम्भ हुआ। पहला समाचार-पत्र सन् 1780 ई0 में बंगाल गजट आफ कलकŸा जनरल एडवरटाइजर निकला जिसके सम्पादक जेम्स आगस्ट हिक्की थे। सन् 1826  ई0 में हिन्दी का पहला दैनिक पत्र उर्दन्त मार्तण्ड निकला। इन समाचार पत्रों का देश की आजादी के संघर्ष में अमूल्य योगदान रहा जनमाध्यम के रूप में स्वतंत्रता आन्दोलन को गति दी तथा पत्र जन चेतना व जागरूकता फैलाने का हथियार बन गये, परन्तु स्वतंत्रता पश्चात् समाचार-पत्रों का उद्देश्य बदला। समाचार-पत्रों का व्यवसायिक स्वरूप हो गया। जिन पत्रों का लक्ष्य सूचना देना, ज्ञान वृद्धि करना, मनोरंजन करना था। जिन पत्रों का लक्ष्य सूचना देना, ज्ञान वृद्धि करना, मनोरंजन करना था। उन पर अब विज्ञापनदाताओं, राजनीति व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दबाव पड़ने लगा। नये माध्यमों के प्रवेश व नयी तकनीकों के प्रयोग ने पत्रों की प्रणाली व नीतियों पर अनेक परिवर्तन किये। इन्टरनेट व फोटो पत्रकारिता की माँग बढ़ी। इलेक्ट्रानिक समाचार-पत्र भी आये।
पत्रिका-
जनमाध्यम के रूप में पत्रिकाओं की अहम भूमिका है। विभिन्न
पत्रिका-
जनमाध्यम के रूप में पत्रिकाओं की अहम भूमिका है। विभिन्न
विषयों जैसे समाचार आधारित (फ्रंट लाइन, इण्डिया टुडे, आउठ लुक) खेल पर आधारित क्रिकेट सम्राट, स्पोर्ट्स लाइन, बिजनेस, शैक्षणिक प्रतियोगी, बाल, महिला, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अनेक पत्रिकायें आ रही है। यह पत्रिकायें अनेक अवधि वाली होती है। जैसे दैनिक साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक अर्द्धवार्षिक, वर्षिक, विशेषांक आदि। हर पत्रिका का अपना पाठक वर्ग होता है।
पत्रिकाओं में विज्ञापन हेतु पृष्ठों के हिसाब से स्थान खरीदा जाता है। रंगी विज्ञापन का मूल्य अधिक होता है। इसमें कई सारी स्थायी स्तम्भ समसामयिक लेख तथा मनोरंजन सामग्री होती है। घटना की गहराई व पुष्ट प्रमाणों की सहायता से कथा तैयार करता है। पत्रिका में अधिकतर साहित्यिक व आकर्षक भाषा शैली का प्रयोग किया जाता है।
बौद्धिक वर्ग आज भी समाचारों के विश्लेषण व रिकार्ड रखने हेतु पत्रिका को उपयोगी जनमाध्यम मानते हैं।
इलेक्ट्रानिक मीडिया
रेडियो इलेक्ट्रानिक जनमाध्यम की श्रेणी में आता है। इस जनमाध्यम को श्रव्य समाचार पत्र कह सकते हैं। यह कानों का विस्तार है। सुन्दर दुर्गम स्थानों तक इसकी पहुंच है। भारत में रेडियो की शुरूआत विधिवत् ढंग से 1927 में हुयी रेडियो सस्ते दामों में मिल जाता है। यह एक जनमाध्यम के रूप में निष्पक्ष भूमिका का निर्वाहन कर रहा है। यह सस्ते दामों में उपलब्ध होता है। रेडिया का प्रसारण गाँवों और देश के दूर इलाकों में विभिन्न भाषाओं और बोली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसे यात्रा के वक्त या अन्य कार्य करते हुए भी सुन सकते हैं। बिजली रहे या नहीं यह बैटरी से चल सकता है। नेत्रहीनों के मनोरंजन का तो एकमात्र सहारा है रेडियो अनपढ़, पढे़-लिखे, अमीर-गरीब सभी के समान है। जनमाध्यम के रूप में रेडिया भारतीय संस्कृति की रक्षा कर रहा है। यह एक लोकप्रिय जनमाध्यम है।
टेलीविजन-
सन् 1926 में 27 जनवरी को जॉन  बेयर्ड ने टेलीविजन का आविष्कार कर जनमाध्यमों की दुनिया में क्रान्ति ला दी। अगर रेडियो का आविष्कार एक चमत्कार था तो जनमाध्यम के रूप में टेलीविजन का आविष्कार एक आश्चर्य था। रेडियो को केवल सुना जा सकता था, जबकि टेलीविजन को देखा और सुना दोनों जा सकता था।भारत में इसका आगमन 1959 को हुआ।
टेलीविजन आधुनिक जीवन शैली का अनिवार्य व अभिन्न अंग बन गया है। वर्तमान में टेलीविजन हर घर का हिस्सा है। जनमाध्यम के साधन के रूप में टेलीविजन को ज्ञान व सूचना प्राप्ति के साथ-साथ मनोरंजन का साधन समझा जाता है। टेलीविजन ने दूरस्थ क्षेत्रों में ना सिर्फ घुसपैठ की वरन् सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में हलचल मचा कर रखी दी। टेलीविजन श्रव्य-दृश्य माध्यम है और ही सीखते है और फिर अपने व्यवहार में लाते हैं। लेकिन वर्तमान में मनोरंजन का यह माध्यम समाज के लिए चुनौती कर उभर रहा है।
भारत में सामुदायिक रेडियों का विकास-
1923-24 से रेडियो क्लब के रूप में और 1927 से भारत में रेडियो भारतीय जनमानस को शिक्षा, सूचना, मनोरंजन देने का कार्य कर रहा है।
सामुदायिक रेडियों के चलन का अभियान 1990 के दशक से शुरू हुआ। वर्ष-1991 के आसपास जैसे ही उदारीकरण के नाम पर बाजार खुला देश में कई माध्यमों की अवधारणाओं का अंकुर फूट पड़ा, यह वह दौर था, जब प्रिन्ट, इलेक्ट्रानिक मीडिया और गॉव तक पहुँच रहे थे। इन माध्यमों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ बाजार में खड़ा करने की पुरजोर कोशिशों के बीच ही सामुदायिक रेडियों की अवधारणा पनपी।’
यद्यपि इससे पूर्व कुछ प्रयास किये गये, जो कि समुदायिक ‘‘मीडिया की भावना का पुरजोर प्रतिनिधित्व करते थे। 1980 के दशक में मैकब्राइड कमीशन की रिपोर्ट में यह सुझाव था कि स्थानीय स्तरों पर मीडिया को काम करना होगा। परन्तु वर्तमान में सामुदायिक रेडियों का जो स्वरूप है, उसकी नींव वर्ष 1995 में पड़ी थी।
‘‘वर्ष 1995 में उच्चतम् न्यायालय के न्यायाधीश पी0बी0 सावंत ने एक अहम् फैसले में कहा था कि रेडियों पर कोई एकाधिकार नहीं हो सकता और हवाई तरंगों पर सबका अधिकार है। न्यायमूर्ति ने अपने फैसले में साफ लिखा था कि हवाई तरंगे सार्वजनिक सम्पत्ति के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती है ओर इनका उपयोग आम लोगों को शिक्षित करने और उनका जनमत विकसित करने में किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को हमारे संविधान में दी गई वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही अंग माना गया।’’
इस फैसले के बाद देश में सामुदायिक रेडियों स्टेशन स्थापित करने की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रयास हुए और पहली बार लोगों ने जाना कि सरकारी रेडियों नेटवर्क के अलावा भी अपने अलग रेडियों स्थापित किये जा सकते हैं।दिसम्बर, 2002 से भारत सरकार ने सामुदायिक रेडियो के लिए लाइसेंस शैक्षणिक संस्थानों देना स्वीकारा।
देश का पहला कैम्पस रेडियो 2004 को चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय में खोला गया। इसका संचालन एजुकेशन एण्ड मल्टीमीडिया रिसर्च सेन्टर करता है । सारे कार्यक्रमों का निर्माण अन्ना विश्वविद्यालय के मीडिया विज्ञान के विद्यार्थियों द्वारा किया जाता है।
गैर सरकारी संगठन और नागरिक समाज निकायों की लम्बी लड़ाई के बाद 6 नवम्बर, 2006 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय और भारत सरकार ने सामुदायिक रेडियो स्टेशन के लिए दिशा-निर्देश जारी किए।
‘‘सामुदायिक रेडियो वह माध्यम है, जहॉ किसी समुदाय विशेष की जरूरतों को ध्यान में रखकर एक निश्चित भू-भाग के अन्दर रेडियों कार्यक्रमों का प्रसारण करना होता है और प्रसारित कार्यक्रमों में उस समुदाय की सक्रिय सहभागिता होना आवश्यक  है यानि समुदाय के लिए समुदाय के द्वारा समुदाय का प्रसारण।सम्पूर्ण मीडिया को समझने के साथ ही इन मीडिया में कार्यक्रमों की गुणवŸा व मुख्यधारा की सोच का  प्रभाव भी पड़ता है। अतः यदि मीडिया के कर्ता-धर्ता वास्तविक विकास और अपने कार्यो को निष्ठापूर्वक करेंगे तब भारत के गाँवों का वास्तविक विकास सही मायनों में होगा। बस आवश्यकता सही सोच के साथ जनता के वास्तविक हितों के अनुरूप कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता है। ।
                                                            डॉ  साधना श्रीवास्तव

Thursday, April 27, 2017

महिला सशक्तिकरण में सिटी मॉन्टेसरी स्कूल लखनऊ के सामुदायिक रेडियो की भूमिका का विश्लेषण

 महिला सशक्तिकरण में सिटी मॉन्टेसरी स्कूल लखनऊ के सामुदायिक रेडियो की भूमिका का विश्लेषण

वर्तमान में महिलाएं हर क्षेत्र में परचम लहरा रही है। चाहे वह ऑफिस, चिकित्सा, बैकिंग, मीडिया आदि सभी क्षेत्र महिलाओं के प्रभुत्व से अछूते नहीं है। जिससे उनकी भूमिका में बढ़ोत्तरी हो रही है।
महिलाओं के विकास के बिना किसी भी राष्ट्र का विकास संभव नहीं है। इसी दिशा में भारत में महिलाओं की स्थिति आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सुधार हेतु सरकार की विभिन्न योजनाओं को चला रही है। महिलाएँ परिवार, समाज एवं सुदृढ़ राष्ट्र की रचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।  महिला मानव परिवार, सभ्यता एवं संस्कृति का आधार स्तम्भ है।
इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान में महिलाओं के उत्थान के लिए शिक्षा एवं रोजगार से सम्बन्धित समान अवसर, समाज आजीविका, समान कार्य के समान भुगतान के अधिकार दिए गए हैं। इस प्रकार महिलाओं को विकास की मुख्य धारा से जोड़े बिना किसी समाज, राज्य एवं देश के आर्थिक सामाजिक और राजनैतिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है।
महिला सशक्तिकरण भारत में महिलाओं की स्थिति आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से काफी सुधार आया है। स्त्री शिक्षा हेतु सरकार की विभिन्न योजनाओं ने स्त्री साक्षरता में वृद्धि की है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति -जनजाति हेतु आरक्षण की व्यवस्था, चिकित्सा, बैकिंग, मीडिया आदि सभी क्षेत्र महिलाओं के प्रभुत्व से अछूते नहीं है। ऐसे में मीडिया का भूमिका अहम हो जाती है यह शोधपत्र यही जानने का प्रयास है कि सी0एम0एस0 सामुदायिक रेडियो महिलाओं के विकास में क्या योगदान दे रहा है ? महिलाओं की समस्याओं के समाधान के लिए क्या और कैसे कार्यक्रम बना रहा है

भारत में सामुदायिक रेडियो का आगमन -1995 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश के निर्णय कि वायु तरंगे सार्वजनिक है के बाद 18 दिसम्बर 2002 को भारत सरकार द्वारा भारत में सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को स्थापित करने हेतु नीतिगत दिशा निर्देश को पारित किया था। यह दिशा-निर्देश सामुदायिक रेडियो स्टेशन खोलने के इच्छुक व्यक्तियों के एक स्पष्ट रुप से मार्गदर्शिका है।
वर्ष 2002 में भारत सरकार ने देश में सिर्फ शैक्षणिक संस्थाओं जैसे कि आई0टी0आई, आई.आई.एम., सुस्थापित शैक्षणिक संस्थाओं, स्कूल विश्वविद्यालय आदि को सामुदायिक रेडियो स्टेशन चलाने के लाइसेंस देना प्रारम्भ किया।
सामुदायिक रेडियो अपने कार्यक्रमों के प्रसारण के माध्यम से समुदाय के सदस्यों को शामिल कर उनकी समस्या सुनता, चर्चा करता और समाधान प्रस्तुत करता है। यह कोई वाणिज्यिक या पैसों का लाभ करने के लिए नहीं बल्कि सामुदायिक हितों को प्रेरित करने वाली प्रसारण सेवा है।
   सारी बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि सामुदायिक रेडियो का उद्देश्य समुदाय के सदस्यों को शामिल कर समुदाय की सेवा करना है। सामुदायिक रेडियो का फोकस शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, ग्रामीण कृषि और सामुदायिक विकास से संबंधित मुद्दों पर ध्यान में रखकर सांस्कृतिक और स्थानीय मुद्दों और विषयों पर प्रस्तुति और प्रतिबिंबित करने पर रहता है। यह स्थानीय भाषा में ही स्थानीय लोगों की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।
   सी0एम0एस0 सामुदायिक रेडियो के कार्यक्रम और कवरेज क्षेत्र-
सिटी मोन्टेसरी स्कूल लखनऊ का एक निजी स्कूल हैं। इसकी स्थापना 1959 को डॉ भारती गॉधी और डॉ जगदीश गॉधी ने की थी । यह प्रारम्भिक दौर में प्रेरणादायक और शैक्षणिक कार्यक्रमों का प्रसारण करता था। सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो गैर लाभकारी रेडियो है। यह शहरी और विशेष कर गरीब ग्रामीण समुदाय के प्रति प्रतिबद्व है। यह किसी प्रकार के विज्ञापन नहीं लेता है। यह गोमती नगर 90.4 मेगाहर्टस और ब्डै एल.डी.ए. कानपुर रोड 90.4 मेगाहर्टस की फ्रिकेवेन्सी पर चला रहा है। सिटी मांटेसरी स्कूल के सामुदायिक रेडियो चैनल गोमती नगर और सी0एम0एस0 डिग्री कॉलेज के सामुदायिक रेडियो जुलाई 2005 में केन्द्रीय मानव संसाधन अर्जुन िंसंह ने उद्घाटन किया। जयपाल रेड्डी सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। डा0 जगदीश गाँधी चेयरमैन और मिसेज डा0 भारती गाँधी सी0एम0एस0 की प्रसीडेंट है। यह एक ऐसा प्रयास था जिसने बिना पढ़ी-लिखी और गरीब बच्चों और श्रोताओं को लाभ पहुँचाने की पहल की गयी थी।
वर्ष 2005 में इसको शैक्षणिक रेडियो के लिए लाइसेंस मिला इस दौरान सेलेबस, शैक्षणिक गतिविधियाँ व विषय से सम्बन्धित कार्यक्रम प्रसारित किये जाते रहे जिसमें शिक्षण व छात्र दोनों भाग लेते।
2008 में दिल्ली में एक मीटिंग बुलाकर सरकार में निर्देश किये कि ब्डै को सिर्फ शैक्षाणिक नहीं विकास से जुड़े कार्यक्रम बनाये चहिए। इसके बाद से ही समुदाय की लड़कियों और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी और महिला सशक्तिकरण का माध्यम बनकर सिटी मॉन्टेसरी स्कूल का सामुदायिक रेडियो ने सफलता के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये है।
ग्रामीण विकास व लोकहित के लिए ब्डै ने 6 गाँव के विकास के प्रयास किया। यह गोमती नगर ब्रांच के गाँव मल्हौर, मकदूमपुर,खड़गापुर, और एल.डी.ए. ब्रांच के गाँव झिलझिलापुरवा, गिन्दन खेड़ा, ललईखेड़ा व उसी के पास स्थित सपेरा बस्ती है। इसके साथ ही निजामपुर, मल्हौर, लोनापुर, पखद्मपुर नगर, वीराखेड़ा, ललई खेड़ा अशरफ नगर, नवाबपुर, डिगडिगा, ग्वारीपुरवा, खडगपुर, नूरपूर, अर्जुनगंज, गोमती नगर, तेलीबाग, आलमबाग, एल0डी0ए0, रजनीखंड, उत्तेरेढ़िय, बंगला बाजार, मकइमपुर, अरशफ, नगर, खडगपुर, लोनापुर और अशियाना आदि कवरेज जोन में 10-12 किलोमीटर रेडियस के 20 लाख जनता आती है।
 जिसमें स्थानीय लोगों की सहभागिता रहती है। हेड आफिस से सामुदायिक रेडियो कार्यक्रमों के प्रमुख वर्गीस कुरियन और आर. के. सिंह है। हर्ष बावा, सोमा घोष, वनिता शर्मा, रविन्द्र त्रिपाठी, मदन के साथ स्थानीय समुदाय के अनेक एंकर और सदस्यों की सहभागिता से कार्यक्रमों का निर्माण किया जाता है। 90ण्4 मेंगाहर्ट्ज पर इसके कार्यक्रमों की शुरूआत प्रतिदिन स्ांकेत ध्वनि से रेडियो प्रसारण की शुरूआत होता है। कुछ कार्यक्रमों का प्रसारण प्रतिदिन होता है। जिनमें अर्चना भक्ति गीतों का कार्यक्रम है, जिसमें सर्वधर्म समभाव के आधार पर पॉच भक्ति गीत बजते है। बात पते की में उस दिन से जुड़ी रोचक और खास जानकारी देते है। विशेष तौर पर सोमा घोष और वनिता शर्मा महिला सशक्तिकरण को समर्पित अनेक कार्यक्रमों का निर्माण सामुदाय की महिलाओं के साथ मिल कर उन्ही के लिए करती है। इसके साथ ही अनेक ऐसे नाम है जो समुदाय के लिए प्रेरणास्त्रोत बने है।
    नन्हों की दुनिया बच्चों का कार्यक्रम जिसमें कविता, कहानी और एक रोचक सरप्राइज प्रस्तुती के अंतगर्त ज्ञानवर्द्वक और मजेदार तरीके से बच्चों में मूल्यों का सृजन किया जाता है। कम्यूनिटी गतिविधियां समुदाय की रचनात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर आधरित कार्यक्रम है। गीतों की झंकार समुदाय की पसंद के गीत समुदाय के कलाकारों द्वारा सुनाये जाते हैं। जनहित में जारी-यह लाईन फोन इन कार्यक्रम विशेषज्ञों के माध्यम से सरकारी एवं गैर सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी अपने श्रोताओं तक पहुचाता है। इस कार्यक्रम में कम्यूनिटी श्रोता फोन के माध्यम से विस्तृत जानकारी प्राप्त कर लाभ उठाते हैं।
नारी शक्ति महिला सशक्तिकरण से सम्बन्धित कार्यक्रम है तो ज्ञान अनुभव की बातें प्रेरणादायक है इसमें सी0एम0एस के संस्थापक और प्रबंधक डा0जगदीश गांधी और निदेशिका डा0 भारती गांधी प्रेरक और अनुभवप्रद सीख के साथ अनुभव ज्ञान की बाते बताते है। प्रेरणादायक गीत में प्रेरणादायक गीत  प्रेरणा देते गीत सुनाये जाते है।
अंग्रेजी की पाठशाला में इसमें अंग्रेजी भाषा की जानकारी रोचक तरह से दी जाती है। एक मुलाकात में समुदाय के विशेष लोगों से मुलाकात करवायी जाती है।
हम होगें कामयाब लघु में कुटीर उद्योगों की जानकारी दी जाती है।
योग और हम लाइव फोन इन कार्यक्रम है जिसमें योग विशेषज्ञ के माध्यम से लोगों
को योग के प्रति जागरूकता एवं उससे होने वाले शारीरिक एवं मानसिक लाभों से
अवगत कराता है। इसमें श्रोता फोन के माध्यम से किसी भी विकार को योग से
कैसे दूर किया जाता है इसकी जानकारी प्राप्त करता है।
रंग मंच कार्यक्रम में कम्यूनिटी सदस्यों के माध्यम से नाटकों में, विभिन्न किरदारों के माध्यम से, जीवन सम्बन्धी मूल्यों को समझाया जाता है।
     सरगम शास्त्रीय संगीत पर आधरित कार्यक्रम है। मन की बात आपके साथ परिचर्चा का कार्यक्रम है। एक अनोखी उड़ान में समुदाय के विशेष लोगों से मिलवाया जाता है। ज्ञान दर्पण जानकारी आधरित कार्यक्रम है।
 अनमोल रतन कार्यक्रम में शहर की महिलाओं की उत्थान एवं विकास की
कहानी उनसे की गई बातचीत के माध्यम से श्रोताओं तक पहुंचाई जाती है। जो
क्षेत्र के लिए प्रेरणास्त्रोत का काम करता है।
 माटी के गीत लोकगीतों का लाइव फोन इन कार्यक्रम है जिसमें समुदाय के लोगों को लोकगीतों को सुनने और सुनाने का अवसर मिलता है। हमारी रसोई कार्यक्रम में कम्युनिटी सदस्यों द्वारा व्यंजन बनाने के तरीके श्रोताओं तक पहुंचाये जाते हैं।
युवा मंच कार्यक्रम कम्यूनिटी के युवाओं के माध्यम से सम-सामयिक विषयों
पर परिचर्चाएं करवाता है और स्थानीय युवाओं में प्रेरणा एवं जागरूकता लाने का प्रयास किया जाता है। ढलती शाम को सलाम कार्यक्रम समाज के वरिष्ठजनों को समर्पित है। जिसमें बुजुर्गों द्वारा जीवन मूल्यों एवं अनुभवों से जुड़ी हुई उनकी अपनीही कहानी उन्हीं की जुबानी श्रोताओं तक पहुंचाई जाती है। हम और हमारे कानून लाइव फोन इन कार्यक्रम है जिसमें श्रोताओं को कानूनी सलाह दी जाती है।
सेहत की बात डॉक्टर के साथ जो कि लाइव फोन इन कार्यक्रम है । इसमें डाक्टरों के
माध्यम से लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श दिया जाता है।
अम्मा की बातें  कार्यक्रम में वरिष्ठ ग्रामीण महिलाओं द्वारा अनुभव और जीवन सम्बन्धी व्यवहारिक बातों का आदान-प्रदान किया जाता था।
साथी हाथ बढ़ाना नामक कार्यक्रम के माध्यम से नित्य नये-नये विषयों से, श्रोताओ को सामाजिक कुरूतियों, अंधविश्वास एवं रोगों सम्बन्धी समस्याओं को दूर करने का प्रयास था। सामुदायिक रेडियो का फोकस सामुदायिक रेडियो सेवा पर कार्यक्रमों, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, ग्रामीण कृषि और समुदायिक विकास से संबंधित मुद्दों पर ध्यान रखकर सांस्कृतिक और स्थानीय मुद्दों और स्वरूप, विषय, प्रस्तुति और प्रतिबिंबित करने पर रहता है। यह स्थानीय भाषा में ही स्थानीय लोगों की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है। कृषि गतिविधियाँ व विषय से सम्बन्धित कार्यक्रम प्रसारित किये जाते रहे जिससे स्थानीय किसान व दोनों भाग लेकर जुड़े और कार्यक्रम बनाये चहिए। इसमें कम्युनिटी सदस्य भी सहभागिता करते थे। जमाना बदल गया कार्यक्रम  मैग्जीन विधा पर आधरित बेटियों और महिलाओं की समस्याओ का समाधान खोजता कार्यक्रम है।
महिला सशक्तिकरण व महिलाओं के विकास के विकास के साथ-साथ स्वास्थ्य, कृषि, खेती, रहन-सहन, संगीत पर आधारित होते हैं। महिलाओं से जुड़े कार्यक्रमों के बारे में उन्होंने बताया कि सामुदायिक शोध के दौरान हमने पाया कि महिलाएँ घर में रहती हैं। वह पारिवारिक निर्णयों में कुछ बोल नहीं पाती अतः सामुदायिक रेडियो को महिलाओं के विकास, सशक्तिकरण के बारे में कुछ कार्यक्रम बनाने और प्रसारित करने चाहिए। यह कार्यक्रम उनसे इंटरव्यू, परिवार व्यवहार और यह जिस समस्या से जूझ रही है उन पर चर्चा करनी चाहिए। समाधान देना चाहिए और वकीलों से कानूनी सलाह पर आधारित कार्यक्रम भी बनाते हैं इसी प्रयासों महिलाओं में स्वास्थ्य के साथ-साथ अन्य बातों की जागरूकता आयी है।
इस प्रकार यह कह सकते है कि महिलाओं के द्वारा कार्यक्रम निर्माण और संचालन में समुदाय की महिलाओं के साथ मिल कर उन्ही के लिए प्रसारण भी करती है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो स्टेशन से अनेक ऐसे नाम है जो समुदाय के लिए प्रेरणास्त्रोत बने है।
छेनावती  20 वर्षीय छेनावती स्टुडियों मे मार्च 2009 को आयी थी। उसने एक भजन सुना था। उसने पहले एक भजन सुनाया फिर धीरे-धीरे अन्य रेडियो कार्यक्रमों मे भागीदारी की । एंकरिंग और कम्प्यूटर वर्क सीख। समय के साथ वह लाइव फोन इन कार्यक्रम और रिर्काडेड सभी प्रकार के कार्यक्रमों मे भागीदारी लेने लगी। छेनावती एक सक्रिय श्रोता के साथ वलेन्टियर भी है। वह गॉव महिलाओं को लोकगीत गाने के लिए प्रेरित करती है।छेनावती के ब्यक्तित्व विकास में सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो का बहुत योगदान है। वह मानती है कि पहले उसे किसी अजनबी से बात करने में संकोच लगता था। एक झिझक होती, लेकिन जब से उसे अवसर मिला एक मंच मिला उसका व्यक्तित्व बदल गया।
शिवानी अग्रवाल- 20 वर्षीय पोलियों की बीमारी से जूझती शिवानी फोन इन कार्यक्रमों मे सक्रिय भागदारी करती थी। समय के साथ उसने सामुदायिक रेडियो स्टेशन आना शुरू किया। एंकरिंग, एडिटिंग तथा कम्पयूटर का काम सीखा। शिवानी का कहना है कि पहले वह सबसे बात करने में भी डरती थी लेकिन जब से सामुदायिक रेडियो स्टेशन से जुड़ी उकी सारी झिझक दूर हो गयी ।अब वह माइक पर बोल सकती और उनके भजन और कविता नियमित रूप मे बजने से उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया है।
नन्दनी- नन्दनी स्नातक की छात्रा है रेडियो स्टेशन मे जोड़ा वर्तामान में ना सिर्फ वह कुशलता से एंकरिंग कर रही है बल्कि दो बार दिल्ली जाकर वर्कशाप मे भागीदारी की है। अपी प्रतिभा के बल पर उसने मिसाल कायम की जनवरी 2014 मे महिला कार्यशाला में वह ट्रेनर बनी उसने अन्य महिलाओं ट्रेनिंग दी । पया, शालिनी, मालती, श्रुति अनेक  स्थानीय समुदाय के सदस्य है जो सक्रियता से सामुदायिक रेडियो स्टेशन के इन डोर और आउटडोर सभी कार्यक्रमों में भाग लेते है।
राम श्री गुप्ता- महिला सशिक्तकरण का सशक्त उदाहरण है। वह समुदाय की ऐसी सदस्य है जो स्वयं तो पढ़ ही रही है साथ ट्यूशन पढ़ा समुदाय के बच्चों में शिक्षा का उजाला फैला रही है। सिविल सेवा की तैयारी कर रही राम श्री 2009 से सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो स्टेशन से जुड़ी है। वह दिल्ली मे विज्ञान में सी0 एम0 एस0 की प्रतिनिधि के रूप में गयी थी। अपना देश और नियमित एंकरिग के साथ अन्य मीटिंग और गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी करती है। राम श्री में जो आत्मविश्वास और कार्य के प्रति लगन हैं। समुदाय के अन्य सदस्यों के लिए प्रेरणा स्त्रोत है।
सरिता -21 वर्षीय सरिता रावत गॉव जिलाजिला पुरवा की निवासी है। जिसमे अपना स्नातक पूरा कर लिया है। उसके पिता को पैरालिसिस का अटैक  आने के कारण उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका है कि वह पारिवारिक दायित्वों मे पूर्ति में असक्षम है।सरिता का स्वास्थ्य भी खराब रहता था। एक बार उसके सी0 एम0 एस0 रेड़ियों स्टेशन के’’ सेहत की बात डाक्टर के साथ’’ में कॉल किया जो प्रत्येक रविवार आता है और अपनी व्यक्गित  स्वास्थ्य  समस्या बतायी दूसरी तरफ  फोन पर डा0 अमिता पाण्डेय थी। सरिता फोन पर अपनी बीमारी जो कि एनीमिया थी से जुड़े व्यक्तिगत सवालों के जवाब देने में संकोच कर रही थी डा0 अमिता ने उन्हे अस्पताल आने की सलाह दी जिसमे सरिता असक्षम थी। उस वक्त सरिता के मदद के लिए सी0 एम0 एस0 की टीम ने महिला एंन्कर भेजी जो कि सरिता को अस्पताल तक ले गयी।सरिता की अस्पताल की फीस और दवाईयों का खर्च पूरा सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो ने वहन किया। इलाज के बाद जल्दी ही सरिता को स्वास्थ्य लाभ हुआ। इसी दोरान सरिता के दिल में छुपे सपनों का जानने का मौका सी0 एम0 एस0 टीम को मिला ।सरिता अच्छे लोकगीत गाती है दूसरों की बातों को गहराई से समझती है उसके दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी।ऐसे में वह अपने गॉव के लिए बहुत कुछ करना चाहती थी। बस फिर क्या था सरिता एंकर के रूप मे रेड़ियो से जुड गयी। उसे सी0 एम0 एस0 रेडियोस्टेशन मे ट्रेनिंग दी गयी। उसने हरी सब्जियॉ खाना शुरू किया साथ ही वह गॉव की अन्य लड़कियॉ के लिए प्रेरणा स़्त्रोत बन गयी। वर्तमान मे सरिता एक कुशल एंकर है। उसने “साथी हाथ बढ़ाना’’ नामक कार्यक्रम में एंकरिग की है ।साथी हाथ बढ़ाना कार्यक्रम विभिन्न ग्रामीण समस्यों और साफ-सफाई के साथ-साथ पानी बचाओं स्वच्छता आदि में जुड़े सामाजिक और स्थानीय समुदाय के मुद्दों से जुड़ी श्र्ृंखला थी।इसी कार्यक्रम को थिमेटिक कैटेगरी का राष्ट्रीय पुरूस्कार 18 फरवरी 2012 को नई दिल्ली के राष्ट्रीय सामुदायिक रेडियो सम्मेलन में मिला। सरिता का कहना है कि ’’मै हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थी लेकिन गॉव में इतने साधन नहीं है।मेरे पास हजारों सपने थे लेकिन पूरा करने का जरिया नही था। मै अपने गॉव के लिए बहुत कुछ करना चाहती थी कुछ कर नही पाती। जबसे सी0 एम0 एस0 सामुदायिक रेड़ियो स्टेशन से जुड़ी हुँ तब से गॉव के लोगो तक अपनी बात पहुँचा पा रही और उन्हे संवेदनशील मुद्दो के प्रति जागरूक भी कर पर रही हूँ। ऐसी अनेक शहरी व ग्रामीण महिलाओं के विकास के लिए समय-समय पर कार्यशलाओं का भी आययोजन करवाता है और अलग से भी रेडियो के माध्यम से प्रोग्राम चलाये जाते हैं। इससे महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार के समस्याओं के समाधान के लिए अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे है। महिलाओं के विकास के लिए शहरी व ग्रामीण महिलाओं के लिए अलग से भी सामुदायिक रेडियो के माध्यम से प्रोग्राम चलाये जाते हैं। इससे महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार के समस्याओं के समाधान के लिए अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा सकता है।
निष्कर्ष एवं सुझाव-

अध्ययन के उपरान्त निष्कर्ष रूप में कह सकते है सी0एम0एस0 सामुदायिक रेडियो की संकल्पना ने महिला सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभायी है। जो कि अग्रलिखित है।
ऽ महिला साक्षरता पर विशेष ध्यान देकर।
ऽ रेडियो के कार्यक्रमों के माध्यमों से अंधविश्वास व रूढ़िगत बातों को दूर किया।
ऽ विभिन्न आयु समूह की महिलाओं की शिक्षा और व्यवसाय शिल्प, प्रशिक्षण, स्वरोजगार, व्यवसाय  कार्यक्रम प्रसारित किये ।
ऽ महिलाओं को कानूनी सलाह सम्बन्धी कार्यक्रमों का निर्माण किया।
ऽ महिलाओं के मनोरंजन हेतु उनकी रूचि के अनुरूपक कार्यक्रम बनाकर ।
ऽ महिलाओं को बचत व लोन और वित्तिय स्कीमों की जानकारी देकर।
ऽ पारिवारिक और ऐसी व्यक्तिगत समस्याओं के लिए ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण किया जाये कि महिलाए अपनी समस्याओं का समाधान खोजा।
ऽ सामुदायिक रेडियों में ऐसे कार्यक्रम प्रसारित किये जाये जिनके माध्यम से वह अपनी लोक कला, परंपरा व हुनर से धन कमाने के  नुस्खे सीखे।
ऽ स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी के कार्यक्रम बनाये।
ऽ महिला-कैरियर सम्बन्धी कार्यक्रमों का निर्माण किया।
भारत की अधिकांश जनसंख्या अभी तक गांवों में रह रही है। इनकी विविध भाषा तथा संस्कृति हैं। इनको राष्ट्र की मुख्य जीवनधारा से जोड़कर ही हम समग्र भारत के विकास का स्वप्न साकार कर सकते हैं। इस सपने को सामुदायिक रेडियो पूरा कर सकता है।
    संदर्भ ग्रन्थ सूची
ऽ जुलाई-सितम्बर, 2004 विदुर, पेज नं0-38 पर संजीव भनावत और क्षिप्रा माथुर।
ऽ  संचार श्री ‘‘शोध-पत्रिका’’, अक्टूबर से दिसम्बर, 07
ऽ इलेक्ट्रानिक मीडिया-डॉ0
ऽ साईमा सैयद जमिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली का शोध पत्र
ऽ दृश्य एवं जनसंचार माध्यम - कृष्ण कुमार रट्ट
ऽ   सामुदायिक रेडियों हैण्डबुक - सोसाइटी फॉर मीडिया एण्ड सोशल डेवलपमेन्ट वाराणसी, 2008
ऽ कु़रूक्षेत्ऱ सितम्बर 2005
ऽ कु़रूक्षेत्ऱ सितम्बर 2006



Wednesday, April 26, 2017

पैसा पैसा

आज क्यो पैसा इतना जरूरी है कि रिश्ते प्यार सब पैसा पैसा किसी को दूसरे का दर्द नही दिखता ?

रुतबा दिखावा पैसा जरूरते  मानवता नही सिर्फ पैसा पैसा

आपको कुछ कहना

Wednesday, March 15, 2017

चस्का लेखिका बनने का

http://hindi.pratilipi.com/team-pratilipi-hindi/pratilipi-lekhni-hasy-vyngy-ank

चस्का लेखिका बनने का
यह कोई कहानी नही, व्यंग्य नहीं मेरी तरह उन लाखों हजारो लोगो की पीड़ा है जो महान रचनाकार बनना चाहते है। बचपन से ही हर किसी को कुछ शौक होता है, कोई बड़ाकर होकर डाक्टर बनना चाहता है तो कोई इंजीनियर, कोई वकील बनने की सोचता है तो कोई फिल्म स्टार बनना चाहता है। मैं सच कहूँ मेरा भी एक शौक था या कहूँ तो है। जनाब वह है मेरा दिलों जान से प्यारा शौक महान लेखिका बनने का। मुझे यह अक्सर आभास होता है कि मुझमें कही अरूधंति राय छुपी है तो कभी लगता है मेरी कलम शोभा डे को भी मात दे सकती है।
हद तो तब हो गयी जब मुझे रातो में ज्ञानपीठ और बुकर साहित्य पुरूस्कार के सपने आने लगे।
ऐसा नहीं है कि यह मेरे साथ हमेशा ही होता है पर जैसे चुनावी बुखार होता है वैसा ही बुखार मुझे होता है लेखिका बनने का बुखार जो हर पाँच वर्ष पर काफी जोर मारता है। यह तो था मेरे शौक का परिचय जनाब अब सुनिए इस शौक ने मेरी क्या गत बनायी।
 जब छोटे बच्चे अपना समय पार्क और खिलौनो के संग बिताते तो मेरा सारा समय पेन कागज व किताबों में उलझा रहता घर वाले शुरू में तो प्रसन्न रहे।
लेकिन जब मेरा शौक धीरे-धीरे उन पर भारी पड़ने लगा जब मेरा कीमती समय पढ़ाई की बजाय इधर उधर की कहानी लिखने में व्यतीत होने लगा।
आपको शायद अटपटा लगे पर शायद हर कहानी कार जीवनी ऐसे ही संघर्षो की नीव पर खड़ी होती है- ऐसा मेरा मानना है।
 मेरी लिखी रचनाओं को प्रकाशन हेतु कोई पुरस्कार ना मिला पुरस्कार या पैसा की तो छोड़िए उन्हे तो छपने योग्य स्थान भी ना मिला।
 समस्या और विकट तब हो गयी जब मेरे बोर्ड की परीक्षा थी और मैं कहानीकार बनने की सनक लिए कागज रंग रही थी। पूरे जोश से मैने घर के दूधवाले गली के मोची और पड़ोस की चाची को केन्द्र में रखकर एक महान कहानी की रचना कर डाली।
एक पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेज भी दी। रोज डाकिया की राह ताकने लगी। इन्तजार करने लगी कि अब पाँच सौ रूपये के साथ एक स्वीकृति पत्र आने वाला ही है। आचनक मेरे सपनो पर व्रजपात हुआ। एक बड़ा धमाका हुआ 2 माह के भीतर ही चेक तो नहीं हाँ अस्वीकृति पत्र के साथ मेरी कहानी एक बैरंग लिफाफे में (जिसमें टिकट ना लगा हो) लौट आयी।
दुख तो बहुत हुआ कुछ निराश भी आयी, पर जनाब गिरते है शहसवार ही मैदाने जंगे में। मेरा हौसला पस्त ना हुआ।
मेरा शौक मेरी सनक बन गया था। धीरे-धीरे मेरा यह शौक और महँगा पड़ा जब रचनाए टाइप की हुयी माँगी जाने लगी। मुझे संकट ने भी आ घेरा। हादसा तो तब हुआ जब चाची को मेरी कहानी की एक प्रति मिल गयी। मेरा अपराध अक्षम्य था आखिर मैंने उनके निजी जीवन को सार्वजनिक बनाने का प्रयास जो किया था।
दण्ड भी मिला था, और फटकार भी साथ मिले थे माँ के हाथो के दो चाँटे। मेरी लेखनी दुनिया के सितम का शिकार हुयी।
 मेरा लेखिका बनने का चस्का दो वर्षो के लिए उतर गया। इसी बीच इण्टर भी कर लिया और जब कैरियर चुनने की बात आयी तो मेरी आत्मा में विद्यमान लेखिका पुनः जाग उठी।
मुझे लगा महादेवी वर्मा जी और सरोनी प्रीतम के बाद मेरी रचनाओं को ही हिन्दी साहित्य में सर्वोतम स्थान मिलने वाला है।
अथक श्रम व प्रयासों के बाद मेरे मन ने कुछ श्रेष्ठ रचनाओं की रचना कर डाली व एक बार फिर 4-5 जगह एक साथ भेज दी छपने हेतु। होना क्या था? फिर वही इन्तजार, फिर वही अस्वीकृत पत्र और बैरंग लिफाफे।
अब तो डाकिया भी मुझे देख मुस्कुराने लगा था। वो मुझे महान लेखिका नहीं एक बैंक समझता था जो हर कुछ दिनों के अन्तराल पर बैरंग लिफाफे के आगमन पर कुछ पैसे देती है।
मेरे लेखिका मन का सुनामी एक बार फिर शांत हो गया।
मेरे पढ़ने का शौक जारी था जिसका परिणाम मेरी आँखों पर झाॅकते मोटे काले चश्मे थे।
कुद वर्षो के उपरांत अचानक मेरे सोए शौक को मेरे मन की लेखिका ने पुनः जगा दिया। धीरे-धीरे मेरा लेखिका बनने का चस्का इतना बढ़ता गया कि मेरा मन हर घटना में एक कहानी ढँूढने लगी। मेरा पूरा जेबखर्च कागज, पेन, कम्प्यूटर टाइपिंग व फोटो-स्टेट की दुकानों पर खर्च होने लगा।
सारे दोस्त मुझे पढ़ाकू और चश्मीस कह कर चिढ़ाने लगे।
लोग मेरे बगल में बैठने से डरने लगे उन्हें ऐसा लगता कि मैं उन्हें बैठाकर कहानी सुनाने लगूँगी। मेरे अन्दर की लेखिका को यह धिक्कार एक उपहार लगा और मेरा संघर्ष जारी रहा।
लम्बे अन्तराल के बाद मेरी कहानी जब छपने हेतु पुनः भेजी संपादक का जवाब आया ‘‘कि आप अन्यथा न ले परन्तु अब आप अपनी रचनाएं प्रकाशन हेतु ना भेजंे। मेरे अन्दर आपकी रचनाओं को पढ़ने का साहस नहीं है।
कुछ दिनों बाद गलती से एक लोकल अखबार में मेरी रचना छप गयी तो उस अखबार को अपना दफ्तर बंद करना पड़ गया। आखिर पाठकों को भी रचना रास ना आयी। लेखिका ने अपनी सम्पूर्ण रचनाओं, लेखन सामाग्री की ठीक वैसे ही होली जला दी जैसे गाँधी जी ने अंगे्रजी वस्त्रों की होली जलायी थी।
अगले दिन जब मूड फ्रेश करने के लिए मैं टी0वी0 देख रही थी कि कौन बनेगा करोड़पति द्वितीय का प्रचार आ रहा था, ‘‘ ये है मि0 नजारे.............. डोन्ट लूज होप इज मोरल आफ द स्टोरी। कुछ दिनों बाद हैरी पोर्टर की लेखिका राांलिग के संघर्षो की कहानी पढ़ी।
फिर से लेखिका बनने का जोश जाग उठा। नये पुराने आइडियों को जोड़ कुछ इधर से कुछ उधर से चुरा कर एक कहानी की रचना कर डाली। घर में सभी मेरे इस लेखिका बनने से त्रस्त है।
उन्होनें भी हार मान ली है और यह हकीकत जान ली है कि मेरा कुछ नहीं हो सकता। लेकिन हमने नहीं हिम्मत हारी है मेरी लेखिका बनने की तैयारी है। रोज लगाते समाचार पत्र के दफ्तर के चक्कर और खोजते है नये-नये पब्लिसर्श के चक्कर। सब कहते है मुझमे क्या है खास, मेरी हर कहानी है बकवास।
भगवान यह आप निर्भर करता है कि आप कब मेरा भाग्य सुधारेगें और मेरे लेखन को सुधारेगें। मेरा चस्का पंचवर्षीय चुनाव नहीं बल्कि वर्तमान में होने वाले चुनावों की भाॅति रोज जीतता हारता है कभी दल बदलता तो कभी अपनी लेखन के भविष्य को सोचता है। बाकी लेखको से अनुरोध है मेरे हालात पर करे विचार और मेरी तरह ना ले चांस। टी0 वी0 और इलेक्ट्राॅनिक युग में आज लेखक तो बड़े उदास है।              
डाॅ0 साधना श्रीवास्तव, इलाहाबाद            



Friday, March 10, 2017

सोशल मीडिया के सामाजिक सरोकार


सोशल मीडिया के सामाजिक सरोकार
http://admission.onlineuprtou.in/WorkShop/WorkShopMaster/seatAvability/Mzg=

वर्तमान समय में सोशल नेटवर्किग साइटस युवाओं के जीवन में खास भूमिका का निर्वाहन कर रही है। टिवटर, और फेसबुक जैसी अनेक सोशल नेटवर्किंग साइट् स्वतंत्र अभिव्यक्ति का मंच बन रही है तो वही वॉट्सप पर दिनरात की चैटिंग और ब्लाग के माध्यम से रचनात्मक निखारने का मौका मिल रहा है हम अपने ब्लॉग   कैसे और अच्छा बना सकते है। .और कैसे इससे इनकम कर सकते है .. सेमिनार एक प्रयास है आपका सबका आशिर्वाद और साथ चाहिए।  शोध पत्र आमंत्रित है. 

Saturday, December 3, 2016

करम करम अपना

करम करम अपना


करम अपना 

अपना धूप अपने चरम पर थी, सूर्य जैसे आग उगल रहा था.
मानो भगवान भास्कर कुपित हो माना सड़क के किनारे खड़ा किसी गाड़ी के आने की प्रतीक्षा पिछले 10 मिनट से कर रहा था.
उसकी गाड़ी खराब हो गई थी वरना अभी तक वह आधे रास्ते का सफर तय कर चुका होता.
मानव  एक डॉक्टर है, जो शहर के प्रतिष्ठित नर्सिंग होम में इंटर्नशिप कर रहा है.
 आज गाड़ी खराब हो गई थी तो ऑटो से जाना उसकी मजबूरी थी ,  नहीं तो कहीं भी आना जाना हो उसे अपनी गाड़ी ही पसंद थी. ना इंतजार ना भीड़ और न ट्रैफिक का चक्कर वह शहर के हर गली मोहल्ले से परिचित था जब कभी भी ट्रैफिक जाम देखता तो शॉर्टकट मारता और मिनटों में अपनी मंजिल पर होता.
 ड्राइवर की आवाज में उसके ध्यान को तोड़ा कहां जाना है? 
 मानव ने देखा विक्रम ऑटो अरे बाप रे उसकी तो सांसे अटक गई. 
 बाप रे इतने बड़े ऑटो में चार चार सवारी एक साथ बैठती कितनी घुटन बदबू कैसे होगा? 
 मानव ने देखा वह ऑटो पहले से ही भरा हुआ था तीन साधु,  दो सब्जी वाले,   दो औरतें ऑटो पूरा फुल उसने इस में बैठने से भी इनकार कर दिया वह थोड़ी देर और मुसीबत झेल सकता था थोड़ी देर और इंतजार कर सकता था परंतु इस भीड़ को बर्दाश्त नहीं कर सकता था.
मोबाइल की घंटी बज उठी फोन नर्सिंग होम से था मानव ने समस्या बताकर कुछ समय मांगा प्रत्युत्तर में सीनियर डॉक्टर से दांत मिल गई आधे घंटे के इंतजार के बाद दूसरा विक्रम आया उसमें कुछ शांति जनक स्थिति थी.
 एक नव दंपति छोटी सी बच्ची को गोद में लिए बैठे थे दो कॉलेज स्टूडेंट और दूसरी तरफ एक पतली दुबली सांवली सी लड़की अकेले बैठी थी मानव ने सीट ले ली. मानव के बैठते हैं दो वृद्ध आकर बैठ गये.
 ऑटो तेज गति से स्टार्ट हुआ तेज आवाज डीजल के बदबू और जानलेवा गर्मी मानव के लिए एक अलग अनुभव था.
जिस मानव को उसके मां बाप ने 3 वर्ष की अवस्था से ही अलग रूम और हर ऐसो आराम उपलब्ध करा दिए थे उसके लिए विक्रम में बैठना एक दुखद अनुभव था जो वृद्ध बैठे थे उनमें से एक ज्यादा मोटा था.
 ऑटो जहां किसी गड्ढे में जाता या हिलता ढूंढता तो धक्का मानव को लगता है अचानक बेचारा मानव एक धक्के को सहने पाया और बगल की लड़की से जा टकराया लड़की ने थोड़ा हड़बड़ा कर देखा वह चौक गई थी वॉइस माहौल से अनजान नाक पर रूमाल रखें खिड़की से बाहर नजारों का आनंद ले रही थी उसने मानव को घूर कर देखा और एक बार फिर बाहर देखने लगी.

 मानव को उस लड़की की इस नजर पर बहुत गुस्सा आया फिर भी उसने धीरे से उसे 
 सॉरी कह दिया जब कि गलती उसकी थी भी ना गलती तो उस मोटे आदमी के  के वजन की थी मानव का मन खराब हो गया था. ना जाने उसने कौन से कर्म किए थे कि सुबह से ही उसका दिन खराब दिखता चला गया मन बदलने को करें भी तो क्या करें वह समझ नहीं पा रहा था एक तरफ नर्सिंग होम पहुंचने की जल्दी थी नहीं तो कब का ही 
 ऑटो से उतर जाता.
 तभी अचानक मानव की नजर सामने बैठी बच्ची पर पड़ी जो इन सब परेशानियों से अनजान अपनी मां के सीने से चिपकी आंचल की छांव से सुखी सी दुनिया से   अनभिज्ञ खेल रही थी उसने लाल फ्रॉक लाल जूते और लाल टोपी लगा रखी थी,  उसके पैरों में घुंघरू वाली चांदी की पायल भी थी वह पैर हिला हिला कर जिसे बार-बार बजा 
 बचा रही थी.
 होठो पर मधुर मुस्कान थी. उसके नन्हे नन्हे हाथ पापा के हाथों से मोबाइल लेने को आतुर थे.अचानक तेज ब्रेक के साथ 
 ऑटो
 रुका रुका बच्चे झटके से रोने लगी तो पापा ने रिंगटोन बजा दी झटके से फिर मानव लड़की से जा टकराया लड़की ने गुस्से से कहा क्या ठीक से बैठा नहीं जाता है? 
मानव को अपनी मजबूरी पर बहुत रोना आया उसने धीरे से लड़की को सॉरी कहा और बगल में बैठे मोटे आदमी की ओर इशारा किया अब लड़की को भी लगा कि मानव कितना सुकून कर बैठा है और उस मोटे आदमी के धक्कों से कितना त्रस्त है लड़की बाहर की ओर देखने लगी मानव के मन में अजीब अंतर दर्द था उसे अपना कॉलेज टाइम बचपन मां यह कह तो पूरा अतीत याद आने लगा कैसे कॉलेज में वह सबसे मशहूर था कैसे सब उसे पसंद करते थे क्या लड़के क्या लड़कियां यहां तक की सारे लेक्चर सारे लेक्चरर प्रोफेसर प्रिंसिपल अधिकारी उसकी पढ़ाई करते नहीं थकते थे लेकिन मानव को इन सब से कोई वास्ता नहीं था वह तो बस अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करने को आतुर था कैसे उसकी मां की मौत कैंसर से हुई थी यदि डॉ लापरवाही ना करते तो शायद समय रहते कीमोथेरेपी काम कर जाती परंतु उचित इलाज और डॉक्टरों की लापरवाही के कारण ही वह परलोक सिधार गई अपनी अंतिम इच्छा मैं कह गई कि मानव डॉ बने ताकि मानव अपने डॉ होने का कर्म सही ढंग से निभा कर लोगों की जान बचा सके यही कारण था कि वह कॉलेज में जिस लड़की को पसंद करता था जिसे चाहता था उसे पराया हो जाने दिया अपने प्यार का इजहार भी ना कर पाया उसे याद आने लगे जो डॉक्टर की पूरी पढ़ाई होते ही मिठाई के डिब्बे के साथ आकर मानव में अपना 
 जमाई खोजते मानव ने कभी उस लड़की को बुरी नजर से नहीं देखा जो लड़की उसे पसंद थी उसकी यादों को दिल में बसा ए मानव ने सेवा को अपना मकसद बना लिया उसे आज बगल की लड़की की नजर और उसकी घटिया मानसिकता पर तरस आने लगा सॉरी तो कह दे रहा था पर मन खराब हो गया अचानक जाम खुला और ऑटो पुनः अपनी गति से चलने लगा बच्चे ऑटो के चलने से फिर शांत हो गई उसकी मां उसे पेपर से हवा कर रही थी मां खुद पसीने और गर्मी से बेहाल थी वह बार-बार अपने आंचल से बच्चे का चेहरा छुपा रही थी ताकि बच्चे धूप से बच सकें मानव को अपनी मा याद आने लगी सच मां का स्पर्श और मां की गोद कितनी सुखद होती है जो हर दर्द को खुशी में बदल देती है कहीं कड़ी धूप भी छाया बनकर शीतलता देती है बच्ची अब तक मां की गोद में सो गई उसे इस माहौल में भी सुकून था सभी मानव की निगाह खिड़की से बाहर गई देखा 1:15 16 साल की बच्ची स्कूल ड्रेस में साइकिल चला रही है उसके बगल से एक 40 45 वर्षीय 
 पुरूष स्कूटर से कुछ अभद्र टिप्पणी करते हुए आगे बढ़ गया लड़की गिरते-गिरते बची मानव को बहुत गुस्सा आया कोई पुरुष ऐसा कैसे कर सकता है अपने बेटी की उम्र की लड़की से अभद्र टिप्पणी फिर देखा वह आदमी लड़की के बगल में ही स्कूटर ले जाता है कभी धीमी गति तो कभी स्पष्ट से किसी अश्लील गाने के टूटे-फूटे शब्द मानव का मन उस मनुष्य के लिए घृणा से भर गया सोचा ऐसे ही दुष्ट पापियों नालायक बुरी शैतानी हरकतों के कारण ही लड़कियां शरीफ लोगों को भी शक से देखती हैं इनकी अभद्र टिप्पणियों ने ही नारी मन में पुरुषों के प्रति घृणा का सृजन किया है मानव ने सोचा ना जाने उस पुरुष की मां ने उसे कितने दुलार और चाव से पाला होगा यह धरती का बोझ अपने आ पवित्र इरादों से पुरुष वर्ग को कलंकित कर रहा है अब मानव को उस लड़की का व्यवहार समझ आ गया शायद वह लड़की भी कभी किसी ऐसे ही पापी के कर्मों का शिकार गलत हरकत से परेशान हुई होगी तभी वहां जितनी सबकी हो गई है मानव ने एक नजर उस लड़की के चेहरे को देखा उस लड़की के चेहरे के भाव से स्पष्ट था उसने भी ऑटो से 
खिड़की से वह घटना को देखा था उस लड़की के अनकहे सवालों आंखों में उस घटना के प्रति जो घड़ा देख रहे थे उससे मानव का अंतर्मन चीख उठा उसे कुछ अजीब खोखला पर नजर आने लगा बार-बार उसका मन विचलित हो रहा था आज एक ही दिन में उसे कितने अनुभव में जीवन के कितने रूप देखें अभिव्यक्ति के सभी भावों को महसूस किया अचानक 82 फिर तेज ब्रेक के साथ रुका बहुत भीड़ थी ट्रैफिक रुक गया था ऑटो की स्पीड के साथ ही उसकी विचार श्रृंखला को विराम लगा. पता चला आगे किसी स्कूटर का बहुत भयंकर एक्सीडेंट हो गया है सभी के होश उड़ गए स्कूटर सवार किस सिर पर तेज चोट आई थी जिसके कारण खून तेजी से बह रहा था पुलिस का इंतजार होने लगा मानव मन ही मन मुस्कुराते हुए कहा हे प्रभु क्या लीला है वहां नर्सिंग होम में सब इंतजार कर रहे हैं और यहां एक के बाद एक और मुसीबत वह भी ऑटो से उतर कर घटनास्थल के समीप जा पहुंचा स्कूटर सवार था जो थोड़ी देर पहले लड़की को छेड़ रहा था मानव ने मन ही मन सोचा बहुत बढ़िया भगवान के घर देर है अंधेर नहीं बुरे कर्मों का फल शुभ फल कैसे हो सकता है मानव को समझते देर न लगी स्कूटर सवार अपनी हरकतों के कारण ही अपना संतुलन खो बैठा होगा उसने एक पल को सोचा चलो अच्छा हुआ धरती से कम हुआ पुरुष के माथे का कलंक हो गया तभी उसकी नजर ऑटो मे बैठी बच्ची पर पड़ीजो इस वक्त अपनी मां नहीं पिता की गोद में सुरक्षित थे पिता लंबे-लंबे डग भरता हुआ उस भीड़ को पीछे छोड़ता चला जा रहा था वह अपनी पत्नी से बोला जल्दी जल्दी निकलो यहां से कहीं गुड़िया जाग गई तो खून देखकर डर जाएगी फिर पुलिस आ गई तो कौन लफड़े में पड़ेगा पता चले गवाही के लिए थाने के चक्कर लगाते रहो मानव ने उस दृश्य को देखा और देखते ही सोचा सच मां के समान पिता भी कितना महत्वपूर्ण है मां यदि जीवन की धूप में अपने आंचल की छांव देती है तो पिता अपने बच्चे को संसार की समस्त मुसीबतों से बचाता है मानव को अपने डॉक्टरी का मानवता का पाठ याद आने लगा पाप से घृणा करो पापी से नहीं उसे उसे स्कूटर सवार के संग उसके परिवार की भी चिंता होने लगी तब तक पुलिस आ गई थी मानव को अपने डॉक्टरी का कर्म याद आने लगा फिर उसने मन ही मन ईश्वर को याद किया इस संसार के समस्त अच्छे और बुरे कर्मों का फल देने वाला तो वह है मानव का अध्ययन तो बिना फल की चिंता किए कर्म करने का है वह एक झटके से आंखों से उतर गया उस अनजान घायल की मदद करने उस वक्त उसे सिर्फ अपना कर्म याद था ना कि उस व्यक्ति का वह लड़की प्रश्नवाचक निगाहों से मानव को देखने लगी सच में हर मनुष्य को अपने अपने कर्म का शुभ और अशुभ फल तो भोगना ही पड़ता है
Sadhana shrivastava
 property expert मैगजीन जनवरी 2010 पेज नंबर 100-101  मे प्रकाशित

Friday, December 2, 2016

वाह रे समाज

वाह रे समाज
वाह रे समाज तुम ही जानो अपनी माया
कहने को तो सब कुछ है
सुनने को कानों में रूई को डाला है।
क्या राजा है और क्या फकीरा....
सभी के ऊपर है समाज का घेरा
कथनी और करनी में भटकता है समाज
 कि छोटी-छोटी बातों पर बॅटता है समाज
जो चाहे सड़कों से महलों में बिठा दे
और चाहे महलों को पल में धूल में मिला दे
कितनी हो बाते और तर्क तेरे दामन में
कितनी ही किस्से और कहानियाॅ
लोग क्यों समाज में भीड.का हिस्सा बन जाते है।
और के साथ मिलकर दूसरों का मजाक उड़ाते है।
समाज का हिस्सा न बन ऐ मुसाफिर
न बन समाज का किस्सा.....
कुछ ऐसा कर जा अपने हौंसला से
दूसरों पर हॅसने वाला वाह रे समाज
तेरी वाह-वाही कर जाये।